मैं मानती हू कि जब नाटयसाहित्य के स्वरुप की ही नहीं बल्कि किसी भी साहित्य के स्वरुप की चर्चा करेंगे तब स्वाभाविक रुप से अति उपयोगी रहेगा । क्योंकि साहित्य स्वरुप के संदर्भ ग्रन्थ के रुप में यह पुस्तक विद्यार्थीलक्षी है । दूसरी वजह कहें तो जो भावक है जो ब्रह्मानंद सहोदर का आनंद लेते है पर नाटयस्वरुप के रुप में उनके पास ज्यादा ज्ञान नहीं है तो इस प्रकार की पुस्तक के माध्यम से नाटयसाहित्य के स्वरुप को समजना सरल हो जायेगा । तीसरी वात कहे तो जब किसी विषय पर कार्य करते हैं तो इस प्रकारकी पुस्तको द्वारा वाचक को जानकारी के रुप में मदद मिल सकती है । इस तरह से देखा जाय तो भावको के लिये, विद्यार्थीयो के लिये तथा अध्यापको के लिये यह बहुत उपयोगी है ।
– डॊ. रंजना ए. अवस्थी
